गज़ल
रेल जब गांव से गुज़रती है
तेरी तस्वीर क्यों उभरती है
आप ठहरें तो आप की मर्जी
वक्त की नब़्ज़ कब ठहरती है
इक तमन्ना किसी को पाने की
रोज़ जीती है रोज़ मरती है
ज़िन्दगी को संभालिऎ साहब
ज़िन्दगी हर कदम बिखरती है
जब भी होते हैं शहर में दंगे
ज़िन्दगी ज़िन्दगी से डरती है
रफीक जाफ़र |